अंधेरे में बहुत ही तीर फेंके हैं;
खुदा पर जाने कितने पीर फेंके हैं!
कहा उस से, ‘बुला ले ऐ मेरे आका!’;
मगर वो सांसों की जंझीर फेंके है!
नहीं उठ पायेंगे वो रेहनुमा-ए-फन;
हमीं ने उन पे गालिब-मीर फेंके हैं!
हुआ क्या एक मिसरे पे करम-ए-दाद,
तभी से वो पुरी तफसीर फेंके है!
किसी को मिल गई क्या जन्नतुल फिरदौस?
फलक पर किसने बादल चीर फेंके है?
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કામ પર આવ્યો અને રચના વાંચી.
પહેલા ત્રણ શે’ર તો સમજાયા અને બહુ ગમ્યા.
મક્તામાં “તફ઼સીર” શબ્દ સમજાયો નહીં
ઘરે ઊર્દૂ-ગુજરાતી શબ્દકોશ પડ્યો છે તે જોવો પડશે.
Sir,
Simplly great. Loved this gazal. Accept my salute…
Sam
बहोत अच्छे जनाब !
‘सांसों की जंजीर’ वाला रुपक अधिकतम पसंद आया ।
अभिनंदन.
vaah vaah doctor saab